मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप।
नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।
कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल।
सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।।
जीव मारना पाप है कहते हैं सब लोग।
मच्छड़ का फिर क्या करें फैलाता जो रोग।।
दुखित गधे ने एक दिन छोड़ दिया सब काम।
गलती करता आदमी लेता मेरा नाम।।
बीन बजाये नेवला साँप भला क्यों आय।
जगी न अब तक चेतना भैंस लगी पगुराय।।
नहीं मिलेगी चाकरी नहीं मिलेगा काम।
न पंछी बन पाओगे होगा अजगर नाम।।
गया रेल में बैठकर शौचालय के पास।
जनसाधारण के लिये यही व्यवस्था खास।।
रचना छपने के लिये भेजे पत्र अनेक।
सम्पादक ने फाड़कर दिखला दिया विवेक।।
रविवार, 1 अप्रैल 2012
शुक्रवार, 2 मार्च 2012
मैं अब भी इंतजार मे था
ना जाने क्यूँ उसके ....
हर पल हर लम्हे उसके
वह जो मेरा ना था ....
फिर वह लम्हा भी आया
जहाँ प्यार ने मुझे अपनी बांहों
अपनी बांहों मे समेट लिया
उस की उंगलिया मेरे बालो
मेरे बालो से खेलने लगी थी
मैं आँखे बंद कर उसके सीने
उसके सीने से लगा रहा
और फिर उसकी गोद मे
गोद मैं खुद कों पाया
प्यार का यह लम्हा ऐसे था
मैं खुद से मिल गया
ऐसे जैसे रेगिस्तान मे
एकाकार बारिश हो गई
मैं तृप्ति पा गया ...
--पवन अरोड़ा---
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