गुरुवार, 3 मई 2012
सौ साल के सिनेमा ने
गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
बस दिल्ली का समाचार है
हो करके बेदम पहुँचे।
हर चैनल में होड़ मची है,
दिखलाने को गम पहुँचे।
सब कहने का अधिकार है।
चौथा-खम्भा क्यूँ बीमार है।
गाँव में बेबस लोग तड़पते,
बस दिल्ली का समाचार है।
समाचार हालात बताते।
लोगों के जज्बात बताते।
अंधकार में चकाचौंध है,
दिन को भी वे रात बताते।
चौथा - खम्भा दर्पण है।
प्रायः त्याग-समर्पण है।
भटके हैं कुछ लोग यही तो,
सुमन-भाव का अर्पण है।
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
खार में भी प्यार है
वक्त से मिलती खुशी भी, वक्त ही दीवार है
वक्त कितना वक्त देता, वक्त की पहचान हो
वक्त मरहम जो समय पर, वक्त ही अंगार है
वक्त से आगे निकलकर, सोचते जो वक्त पर
वक्त के इस रास्ते पर, हर जगह तलवार है
क्या है कीमत वक्त की, जो चूकते, वो जानते
वक्त उलझन जिन्दगी की, वक्त से उद्धार है
वक्त होता क्या किसी का, चाल अपनी वक्त की
उस रिदम में चल सुमन तो, खार में भी प्यार है
मंगलवार, 17 अप्रैल 2012
कुछ लोगों की फितरत है
कारण तो बस अपना मतलब, जो काबिले नफ़रत है
गलती का कठपुतला मानव, भूल सभी से हो सकती
गौर नहीं करते कुछ इस पर, कुछ की खातिर इबरत है
आज सदारत जो करते हैं, दूर सदाकत से दिखते
बढ़ती मँहगाई को कहते, गठबन्धन की उजरत है
कुछ पानी बिन प्यासे रहते, कुछ पानी में डूब रहे
किसे फिक्र है इन बातों की, ये पेशानी कुदरत है
जागो सुमन सभी मिलकर के, बदलेंगे हालात तभी
फिर आगे ऐसा करने की, नहीं किसी की जुर्रत है
इबरत - नसीहत, बुरे काम से शिक्षा
उजरत - बदला, एवज में
पेशानी - किस्मत
मंगलवार, 10 अप्रैल 2012
अखबारों का छपना देखा
चाहे दिन या रात कहो
चाल चलो शतरंजी ऐसी
शह दे कर के मात कहो
जो कहते हैं राम नहीं
उनको समझो काम नहीं
याद कहाँ भूखे लोगों को
उनका कोई नाम नहीं
अखबारों का छपना देखा
लगा भयानक सपना देखा
कितना खोजा भीड़ में जाकर
मगर कोई न अपना देखा
मिलते हैं भगवान् नहीं
आज नेक सुलतान नहीं
बाहर की बातों को छोडो
मैं खुद भी इंसान नहीं
अनबन से क्या मिलता है
जीवन व्यर्थ में हिलता है
भूलो दुख और खुशी समेटो
सुमन खुशी से खिलता है
रविवार, 8 अप्रैल 2012
भाई से प्रतिघात करो
मजबूरों से काम न लो
वक्त का पहिया घूम रहा है
व्यर्थ कोई इल्जाम न लो
धर्म, जगत - श्रृंगार है
पर कुछ का व्यापार है
धर्म सामने पर पीछे में
मचा हुआ व्यभिचार है
क्या जीना आसान है
नीति नियम भगवान है
न्याय कहाँ नैसर्गिक मिलता
भ्रष्टों का उत्थान है
रामायण की बात करो
भाई से प्रतिघात करो
टूट रहे हैं रिश्ते सारे
कारण भी तो ज्ञात करो
सुमन सभी संजोगी हैं
कहते मगर वियोगी हैं
हृदय-भाव की गहराई में
घने स्वार्थ के रोगी हैं
शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012
खुदा भी क्या मौसम देते हैं
वो बदले में गम देते हैं
जख्म मिले हैं उनसे अक्सर
हम जिनको मरहम देते हैं
हैं नफरत के काबिल फिर भी
प्रीत उन्हें हरदम देते हैं
देहरी उनके दीप जलाया
जो लोगों को तम देते हैं
जिनकी वाणी में अंगारा
व्यर्थ उन्हें शबनम देते हैं
बरसातों में प्यासी धरती
खुदा भी क्या मौसम देते हैं
सबकुछ सुमन दिया अपनों को
फिर भी कहते कम देते हैं
सोमवार, 2 अप्रैल 2012
मंहगाई के रंग
मंहगाई के रंग
सीख लिया
आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया
महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं
सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया
दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने
धन को ही परमेश्वर माना, अवसर चुनना सीख लिया
रिश्ते भी बाज़ार से बनते, मोल नहीं अपनापन का
हर उसूल अब है बेमानी, हटकर सटना सीख लिया
फुर्सत नहीं किसी को देखें, सुमन असल या कागज का
जब से भेद समझ में आया, जमकर लिखना सीख लिया
रविवार, 1 अप्रैल 2012
मच्छड़ का फिर क्या करें
नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।
कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल।
सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।।
जीव मारना पाप है कहते हैं सब लोग।
मच्छड़ का फिर क्या करें फैलाता जो रोग।।
दुखित गधे ने एक दिन छोड़ दिया सब काम।
गलती करता आदमी लेता मेरा नाम।।
बीन बजाये नेवला साँप भला क्यों आय।
जगी न अब तक चेतना भैंस लगी पगुराय।।
नहीं मिलेगी चाकरी नहीं मिलेगा काम।
न पंछी बन पाओगे होगा अजगर नाम।।
गया रेल में बैठकर शौचालय के पास।
जनसाधारण के लिये यही व्यवस्था खास।।
रचना छपने के लिये भेजे पत्र अनेक।
सम्पादक ने फाड़कर दिखला दिया विवेक।।
शुक्रवार, 2 मार्च 2012
सोमवार, 2 जनवरी 2012
इस बार स्वदेशी नववर्ष विक्रमी सम्वत- 2069 ,
लोग बदल गये ,
सोच बदल गयी ,
नही बदला तो ,
... मन - जो व्याकुल है,
भारत और इंडिया के जंजाल मे ,
इंडिया पाश्चात संस्कृति का अदभुत चेहरा है
जहाँ व्यबसाय और गुंडो का पहरा है ,
भारत मे जहाँ समाज है
उसकी लूट मे सब बर्बाद है
हमारा नववर्ष पतझड़ में नहीं
वसन्त ऋतु में आता है
इस बार स्वदेशी नववर्ष विक्रमी सम्वत- 2069 , अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार 22 मार्च 2012 (वीरवार), गुरुवार शाम 07 :10 बजे शुरू हो रहा है और हम वसन्त ऋतु में अपना नववर्ष मनाएँगे !
शनिवार, 25 जून 2011
जनता निकल रही है एक आन्दोलन को
बढ़ा दो तेल के दाम
बढ़ा दो गैस के दाम
क़त्ल कर दो सारे आम
की कोई नहीं चल पाए
न खा पाए , न पी पाए
न ही ये सपने में सोच पाए
हालातो से टकराना
लेकिन जो अब तक न हुआ वो अब होगा
अब होगा चौराहों पर , सडको पर , घर पर
पार्टी नहीं बंद करेगी ,
जनता निकल रही है एक आन्दोलन को
जो घर पे टी वी के सामने नहीं ,
कोम्पुटर पे नहीं , दोस्तों में नहीं,
बल्कि सीधे सरकारों को खड़ा करेगी
चौराहों पे......
खड़ा करेगी.......
ये जनता ..
अपने देश के लिए कुछ भी करेगी
ये जनता ......
जानती है और बताएगी
कितनी औकात है
जनता में ........
अब देखना है की
(जनता )इन मुर्दों में जिन्दा कितने है
उठते उफान को जब शब्द नहीं मिलते है
तो मंजिल ऐ उन्हें हथकढ़ी मिलती है
और सिलसिला ता उम्र चलता है
तारीख पेशी सजा , और इनकाउनतर
हालत ऐ इनाम मिलता है
जो समझ रखते है शब्द की
परिभाशाओ की ,मर्यादायो की
उन्हें आधी रात उखाड़ा जाता है
भूखो को, महिलाओ को मासूमो को |
फरमान आया है
मुनादी बजवा दो
की कोई बाबा या गाँधी
फिर जनता को न जगाएं
इसका इलाज न करे
ये जनता कुछ दिनों की मेहमान है
फिर ये जिन्दा लाशे
हमारा ही निवाला होंगी |
पर क्यों ?
कही एक
राहगीर जे पी के समय से
एक राह तलाश रहा है
आजादी की
चहरे तलाश रहा है
आजादी के
क्यों ?
छुट्टी पे होने के बाबजूद
सुबह ५-६ बजे आया
क्यों ?
बंधाई उस हिम्मत को
उन क्रांतियो को
एक राह दिखाई
उसने आवाज़ दी
क्योकि सम्बेदना न मर जाये
इन हौसलों बालो की
क्या बदलोगे तुम
क्या क्या बदलोगे ,
क्या बदलोगे तुम
हिन्दुस्तान में
पकिस्तान में
या इरान में
और अपने नाम में
क्या बदलोगे तुम इस दुनिया में
जब सब बदल गए है
जिन्दा मर गए है
कलेजे गल गए है
क्या बदलोगे तुम
दूध घी मिल्लता नहीं
और खुल गए मैखाने है
तुम्हारे सपने बैमानी
और उनके सपने अफसाने है
क्या बदलोगे तुम
गाव में बच्चे माँ का खून पी जी रहे है
और शहरों में माँ बियर पी जी रही है
क्या बदलोगे तुम
सब कुछ तो बदल गया
इमानदार एक गाली है
फूलो का चोर ही माली है
अमीर देश है ये
और घर घर कंगाली है
और क्या बदलोगे
सभ्यता संस्क्रति या धर्म
कुछ नहीं बदला
बस बदल गयी पहचान
कपडे बदले बोली बदली
और बदले अरमान
घर छूट गया
परिवार टूट गया
सब कह रहे है मतलबी इंसान
और क्या बदलोगे तुम
अपनी या मेरी - पहचान
मेरी आँखों में देख कर मुझ से कहो :-
" मैं शपथ लेता हूँ कि
सरकार कि माँ की
कमीनो कि बहन की
भ्रष्टो कि बेटी की
भावनाओ को ठेश नहीं पहुचौन्गा |
२: प्यासे को पानी जरुर पिलाऊंगा
३: देश की आबरू के लिए
अपना तन मन धन नहीं देखूंगा
४ : नहीं देखूगा उस नारी को
जो विदेशी लिबाश में लिपटी हो
५ : नहीं खरीदूंगा उस का सामान
जिसपर हो विदेशी होलोगार्म
६ : नहीं करूँगा उससे बात
जो कहते है अच्छे हालत
७ : मैं खुद में खुदा (भगवान ) धुन्धुंगा
कर इबादत , माफ़ी गुनाहों की
८ : अपने कर्म में धर्म को लाऊंगा
उसको अपना उद्देश बनाऊगा
इसके लिए मरना भी पड़ा तो
खुदा के लिए शीश भी कतऊंगा
मैं खुद को बदलूँगा खुदा से माफ़ी मागूंगा अपने हर उस गुनाह की जो
मै नासमझी में ,गलत प्रचार में , मैं धर्मो की नियम भूल गया ,
मंगलवार, 21 जून 2011
ख़त का राज ..............
लेकिन पिछले दिनों एक चमत कार हुआ एक ख़त के कारण बहुत बड़ा चमत्कार जो काम देश की जनता मिडिया और समाज सेवी ने न किया वो ख़त कर गया | वो ख़त क्या था ...............
दिन 13 जून : अन्ना ने ख़त लिखा सोनिया जी को ..................
दिन २० जून : सोनिया जी ने अन्ना जी को ख़त लिखा .............
दिन २१ जून : अन्ना जी वार्ता में खुश थे कपिल जी भी वार्ता में खुश थे और बारता भी अच्छी हुयी |
येषा क्या था की एक पत्र में की जो जनता का डर नहीं जो किसी का खौफ नहीं वो जो हर बात बात पे खीचा तानी करते थे बात बात पे बैमानी करते थे वो डर गए एक पत्र से जो न डरे पत्रकार से जुटे की बौछार से
क्या था उस पत्र में
रविवार, 1 मई 2011
बाबा का सच क्या है .....
एषा बात चीत के बाद पता चला की कुछ अलग अलग समुदाय के मेरे मित्रो में भी यही बात का समर्थन किया और कुछ लोग का मन आज भी बाबाओ को पाखंडी मानता है जब की किसी भी बाबा ने उनका अहित नहीं किया और न ही उनके करीब में कोई इस पारकर की खबर मिली हां कुछ खबर जो मिली वो समाचार के मध्यम से मिली की किसी baaba ने गलत किया तो इस प्रकार की खबर तो आती ही है कि कोई पुलिश बाला कोई नेता या कोई अफसर भी इस्परकर के कामो में लिप्त पाया गया या कोई बहरूपिया इस पारकर के कामो में पाया गया तो इसमें बाबा को क्यों बदनाम किया जाता है क्या ये किसी साजिस का हिस्सा है कि या कोई नाराजगी जो बहुत समय से जाने अनजाने में हमने ही अपने लोगों को नहीं समझा
बचपन में स्कूल में एक pome सिखाई जाती थी बाबा बाबा ब्लैक शीप ..........और मैंने अकसर बच्चो को बाबाओ के ऊपर ये कमेन्ट करते सुना है की उनको बाबा दीखता है और वो बाबा बाबा ब्लैक शीप का गीत गाने लगते है एक सवाल मन में उठता है आज क्या अंग्रेजी मध्यम की शिक्षा में कविताओ की कमी थी या कुछ कविताओ में संस्क्रती का मज़ाक था इसको विरोध भाष के आधार पे रोका भी जा सकता था
गाँधी को बाबा नहीं महात्मा कहा गया और बापू कहा गया पर केवल कपडे का रंग छोड़ के दोनों का पहनावा एक ही था वो महात्मा गाँधी जिसने विदेश में बकालत पड़ी और देश में है त सूत बूट और बिलकुल अंग्रेगी परिधान और उनका सही पहनावा के साथ पहने थे नव्युबक थे और वकालत पढ़े भी भारत से अफिरिका तक बकालत का रुतवा दिखा चुके थे पर गाँधी जल्द ही जान गए की ये कानून भलाई नहीं लूटने के लिए है ये वो तरीका है जिसमे वक्ती खुद को नहीं समय को ढोस देता है ये तो जुए की तरह है जो जनता है वो जीतता है जो नहीं जनता है वो भाग्य को कचोटता है पर इसको ज्ञान नहीं मानता है क्योकि वो vidhya को chamatkaar मानता है
गाँधी देश में देश वाशियो के मन में गाँधी के पार्टी श्रधा नहीं दिखती उससे अधिक तो भारत देश के गाँधी परिवार और कुछ औधोगिक घराने और कुछ अभिनेताओ एवं नायिकाओ तक ही सिमित कर रह जाता है इसा लगता है की जो हमने ये अपना टीवी ख़रीदा है वो इनकी कहिरियत के लिए करीदा है और इनका तराना देखने के लिए ये दिश या दी टी एच ख़रीदा है
गाँधी को आदर्श माँ कर एक मुन्ना भाई की फिल्म हित होती है और गंध को ही आदर्श माँ कर अन्ना का आन्दोलन एक अविसनिय रूप में आता है पर एक किताब है गांधी की "मेरे सपनो का भारत " india on my dreams जो की किताब हिंदी में बहुत कम छापी है अगर आप को मिल जाये तो आपने आप को महान कहिये गा 30-४० रु की किताब है ये पर मिलना इतना मुस्किल की क्या बताया जाये हिंदी में क्योकि इस किताब के मध्यम से लोग गाँधी को समझ जाते और आज के गाँधी को भी
इस पारकर के वतान्वरण में गाँधी बाबा और धर्म में विस्वाश रखना और उसपर लोगों के चश्मे को कहना और अग्यानी लोगो का विपछ में बैठना और गायनी का खामोश होना सारी संभावनाओ को विराम लगा देता है की ये बंजर है और इसमें न खेती होगी न पानी आएगा सभ्यता इस्परकर की की हम अपनी सभ्यता को गली दे और हम से अच्छा कोई और नहीं मतलब जिस धर्म में है उसी को हम लोग काट ने को तैयार है पर अपमान में जीकर भी कुछ लोग धर्म का मान रखते हुए देखा है मैंने
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
सोमवार, 8 नवंबर 2010
ओबामा आये हल्ला मच गया
ओबामा आये हल्ला मच गया
मिडिया को एक नया मंच मिल गया
कुछ विरोधी बोले तो सहयोगी वोले
कांग्रेस ने भी आपने हाथ खोले
ओबामा पर तीखे प्रशन हुए
और देश में नजाने कितने जस्न हुए
मुंबई में बुलाकर नज़ारा दिखाकर
सम्बेदना वयक्त की पर पकिस्तान पे खामोश
आने से पहले पकिस्तान को दो अर्ब रूपये के हथियार
उपहार में देने का वादा किया
और भारत को हथीयार खरीदने पर मजबूर
ये है ओबामा कि नीतियाँ जी हजूर
पर आप न हो मायूश
क्योकि कुछ काम है
खुच ख़ास
न ओबामा न ओसामा
न मनमोहन न कोई सम्मोहन
एक था नेता लाल बहादुर सस्त्री
सच से पर्दा गिरा तो
बहुत सा रंग आयगा
पर सच कौन लायेगा
बुधवार, 22 सितंबर 2010
तो डस जाएगा
संस्कृति संस्कार की पीढ़ी
मेहमानों का सत्कार
क्या नहीं है मेरे देश मे यार
माटी की खुशबु
बड़ो का आशीर्वाद
भषाओ की माला
जहाँ हर माँ ने जिगर का टुकड़ा
दिल से लगा पाला
उस देश को खा गया
यह नेता साला
भर अपनी जेब मुह कर काला
फिर भी दीखाता अपना मन उजहला
खेलो मे भी खेल रच डाला
भरा अपना पैसो का थ्येला
विपदा को भी इन्होने खूब सम्भाला
पैसा भर तिजोरी को लगा ताला
खेल रहे बाडरो का खेल
सिवस बैंक का पता नहीं क्या है मेल
इश्वरभी इनके आगे फ़ैल
खूब मौज जब जाते यह जेल
कब तक आखिर कब तक
नहीं उठाते हम क्यूँ आवाज
हमारी ही जमी पर यह क्यूँ
फन फैलाये बेठायह नेता रूपी नाग
अरे मेरे भाई अब तो जाग नहीं
तो डस जाएगा
एक दिन यह नेता रूपी नाग
~~~पवन अरोड़ा~~~
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