रविवार, 10 मई 2009

प्रेम पत्र


बहुत साल पहले एक छोटी सी कविता पढी थी, शायद किन्ही पल्लव जी ने लिखी थी , मुझे अब भी उतनी ही प्रभावी और सामयिक लगती है.......पढिये और बताइये क्या आपको भी.....

क्या तुम मुझे वे सारे पत्र लौटा दोगी,
जो मैंने लिखे थे तुम्हें,
एक एक कर कई बार,
तुम नहीं जानती,
यह ऐसा समय है,
जब प्रतिबन्ध लगा है सपने देखने पर,
कविताओं की बात करने पर,
जब दोस्त हँसते हैं,
और,
चिट्ठियाँ लिखना ,
लगभग मूर्खता समझा जाता है,
मैं पढ़ना चाहता हूँ,
उन पत्रों फ़िर एक बार,
आख़िर क्यूँ लिख गया था,
तुम्हें मैं वे प्रेम पत्र............

3 टिप्‍पणियां:

Himanshu Pandey ने कहा…

उत्कृष्ट कविता से रुबरू हुआ मैं । सार्थक प्रस्तुति । धन्यवाद ।

शोभा ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है।

AMBRISH MISRA ( अम्बरीष मिश्रा ) ने कहा…

dekha manch par dur dur se log aaye aur aap ki kavita ko saraha ye
achcha likha hai aap ne manch ke liye

aur ajay ji aap kahan the manch se gayab kam se kam manch par aap to kuch naya dalte rhaen

dhanybaad

ajay ji es manch ke varisth sadasyo me se ek hai : ambrish misra